यूरोप में 40 डिग्री तापमान आपात स्थिति जैसा माना जाता है, जबकि भारत के कई हिस्सों में यही तापमान सामान्य माना जाता है. इसके पीछे केवल गर्मी नहीं, बल्कि नमी, इमारतों की बनावट, लोगों की जीवनशैली, मौसम के अनुसार तैयारियां और शरीर की अनुकूलन क्षमता जैसे कई कारण जिम्मेदार हैं. जलवायु परिवर्तन के कारण अब दोनों क्षेत्रों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं.
अल-नीनो के कारण दिल्ली में तापमान 42 डिग्री पहुंच गया है, लेकिन नमी बढ़ने से महसूस होने वाला टेम्परेचर 51 डिग्री हो गया है. वेट बल्ब इफेक्ट से गर्मी बेहद खतरनाक हो रही है. लोग परेशान हैं.
यूरोप में 40 डिग्री तापमान घातक क्यों बन जाता है जबकि भारत में लोग इसे सह लेते हैं? असली फर्क नमी, इमारतों, शरीर की आदत और तैयारियों में है. यूरोप गर्मी के लिए तैयार नहीं है.
लगातार पड़ रही हीटवेव और कम बर्फबारी की वजह से स्विट्जरलैंड के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो इस साल भी बर्फ का बड़ा नुकसान हो सकता है.
यूरोप में भीषण हीटवेव से 1300 मौतें हुई हैं. फ्रांस में 1000 से ज्यादा अधिक मौतें हुईं. जलवायु परिवर्तन और अल-नीनो ने गर्मी को और खतरनाक बना दिया है. पश्चिमी यूरोप में इस हफ्ते राहत की उम्मीद है.
यूरोप इस वक्त भीषण गर्मी और हीटवेव के खतरनाक कहर से जूझ रहा है. जानकारी के मुताबिक फ्रांस के बुरे हालात हैं, जहां महज चार दिनों के भीतर करीब 1,000 लोगों की मौत हो चुकी है.
वेनेजुएला में 24 जून 2026 को आए भूकंप से अब तक 1430 लोग मारे गए हैं. 68,900 लोग लापता हैं. ला ग्वायरा राज्य सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ. बचाव के लिए 72 घंटे की समयसीमा खत्म हो रही है.
यूरोप में इस समय रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ रही है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके पीछे सबसे बड़ी वजह क्लाइमेट चेंज और अल-नीनो है. अगर यही हाल रहा तो आने वाले सालों में ऐसी गर्मी और देखने को मिलेगी.
2025 में भारत में मौसम पहले से ज्यादा अनिश्चित रहा. 365 दिन में 360 दिन गर्मी रही है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि क्लाइमेट चेंज के साथ अल-नीनो भी इसकी एक बड़ी वजह हो सकता है.
वेनेजुएला में दो शक्तिशाली भूकंपों ने तबाही मचा दी. 7.2 और 7.5 तीव्रता के झटकों से 235 लोग मारे गए. 4300 से ज्यादा घायल हुए. सैकड़ों इमारतें ढह गईं. हजारों लापता हैं. ला ग्वायरा तबाह हो गया.
यूरोप में पड़ रही रिकॉर्ड गर्मी अब पशुपालन पर भी असर दिखाने लगी है. फ्रांस में बड़ी संख्या में मुर्गियों की मौत के बाद विशेषज्ञ बढ़ते तापमान और मौसम में आ रहे बदलावों को लेकर चेतावनी दे रहे हैं.
अल-नीनो के प्रभाव से यूरोप-अमेरिका में फिर हीटवेव आ रही है. दिन की तेज गर्मी के साथ गर्म रातें सेहत के लिए खतरा बनेंगी. फ्रांस, स्पेन, ब्रिटेन और अमेरिका के कई इलाकों में रेड अलर्ट है.
वेनेजुएला में 24 जून 2026 को 40 सेकंड में 7.1 और 7.5 तीव्रता के दो भूकंप आए. राजधानी कराकास समेत कई इलाकों में इमारतें ढह गईं. अब तक 32 लोगों की मौत हो चुकी है. 700 से ज्यादा घायल हैं.
अल-नीनो के बीच भारत के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में 41 करोड़ बच्चों पर कुपोषण का खतरा मंडरा रहा है. यूनिसेफ के अनुसार सूखे ने बच्चों के स्वास्थ्य और परिवारों की आजीविका को संकट में डाल दिया है.
वेनेजुएला में बुधवार शाम दो शक्तिशाली भूकंप आए. USGS के अनुसार पहले 7.1 और दूसरे 7.5 तीव्रता के भूकंप ने काराकास में कई इमारतें गिरा दीं. लोग सड़कों पर आ गए. सुनामी की चेतावनी भी जारी की गई.
Markets flooded with jamun supply: सोशल मीडिया पर कई पोस्ट्स शेयर की जा रही हैं, जिसमें लोग एक पुरानी कहावत को याद करते हुए कह रहे हैं कि अगर गर्मियों में जामुन के पेड़ पर ज्यादा फल आ जाएं तो उस साल सूखे की संभावना बढ़ जाती है. क्या यह सिर्फ कहावत है या इसमें विज्ञान भी कुछ कहता है? आइए जानते हैं.
वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के मुताबिक अल-नीनो का असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रहेगा. बारिश के पैटर्न में बदलाव से पानी की मौजूदी, खाद्य उत्पादन और जंगलों की सेहत प्रभावित हो सकती है.
EL-Nino Effect: यूरोप में जून 2026 में रिकॉर्ड गर्मी पड़ रही है. फ्रांस में 40 से ज्यादा लोग गर्मी से बचने के लिए नदियों-तालाबों में नहाने गए और डूब गए. कई देशों में 40 डिग्री से ज्यादा तापमान हैं.
अल-नीनो के असर से मुंबई में बारिश और बाढ़ जबकि दिल्ली सहित उत्तर भारत सूखा झेल रहा है. अनियमित बारिश का यह पैटर्न जुलाई-अगस्त में भी जारी रह सकता है, जिससे मौसम की अनिश्चितता बढ़ेगी.
एक नई स्टडी में B ब्लड ग्रुप और टाइप-2 डायबिटीज के बीच संबंध के संकेत मिले हैं. रिसर्च के अनुसार, B ब्लड ग्रुप वाले लोगों में डायबिटीज का जोखिम करीब 28% ज़्यादा पाया गया. हालांकि, इसे कारण नहीं बल्कि एक संभावित संबंध माना गया है. कुछ शोधों में गट माइक्रोबायोम की संभावित भूमिका का संकेत मिला है, लेकिन इस विषय पर अभी और स्टडी की जरूरत है.
पापुआ न्यू गिनी में वैज्ञानिकों ने वॉकिंग शार्क की नई प्रजाति की पहचान की है. यह शार्क अपने पंखों की मदद से कम पानी और कोरल रीफ पर चल सकती है. इसके साथ दुनिया में दर्ज वॉकिंग शार्क की संख्या 10 हो गई है. वैज्ञानिकों का मानना है कि ये शार्क संभवतः सिर्फ पापुआ न्यू गिनी के मिल्ने बे क्षेत्र में पाई जाती है और इसके संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है.